Saturday, May 27, 2017

वो बेचते हैं (Wo Bechte hain)




वो ज़मीर बेचते हैं ,
वो ईमान बेचते हैं ,
इंसानियत के दुश्मन हैं, 
मौत का सामान बेचते हैं

सत्ता की हवस ने
इतना गिरा दिया ,
खुद को कहते हैं मुस्लमान,
और माह ए रमजान बेचते हैं

बड़ी मुश्किलों से रौशन,
किया था अपने दर को,
फैज़, चिरागों के घर,
वो तूफ़ान बेचते हैं

vo zameer bechate hain ,
vo eemaan bechate hain ,
insaaniyat ke dushman hain,
maut ka saamaan bechate hain

satta kee havas ne
itana gira diya ,
khud ko kahate hain muslamaan,
aur maah e ramajaan bechate hain

badee mushkilon se raushan,
kiya tha apane dar ko,
phaiz, chiraagon ke ghar,
vo toofaan bechate hain

Wednesday, November 16, 2016



 मेरा  हिन्दुस्तान  (A Poem by Faiz M. Nafe)


नत्थू की औलादों ने ,
ऐसी आग लगाई है ,
राम-रहीम अब दुश्मन हैं , ...
खून का प्यासा भाई है


क़ानून के रखवाले, जो थे ,
वही आज, कसाई है

देश के लाल , अब द्रोही हैं ,
और द्रोही घर- जमाई है

इन्साफ हो रहा नाम पूछ कर
तू अख़लाक़ है या कन्हाई है

Secular सब Sickcular हो गए
अब गाँधी भी हरजाई है

झूट फरेब का , गरम बाजार ,
प्रेस , सत्ता की, लूगाई है

लूट मची है , शोर मैचा है ,
कमर तोड़ , महंगाई है

भूक से लोग, खुदकुशी  कर रहे ,
अरब-पतियों की, खूब कमाई है

खुद उड़ा रहे Pa-की बिरयानी ,
खा, गोली रहा , सिपाही है

दलित ओ मुस्लिम, को मार रहे ,
और काटवा रहे ख़ुद , गाय है

गिरा है भारत , उठा है भारत
कटा है भारत , जुड़ा है भारत ,
ज़ुल्म और ज़ालिम के आगे ,
कभी नहीं झुका है भारत

वह दिन फिर से आएगा ,
फिर से खेत लहराए गा

फिर ईद दिवाली होगी साथ
फिर होगा , हांथों में हाँथ

फिर गाँधी नेहरू, ज़िंदा होगा ,
फिर आज़ाद, हर बन्दा होगा .

फिर से Akhlaq खेले गा होली ,
राम-रहीम, फिर होंगे हमजोली

यह मेरा देश, ये Faiz की जान ,
यही है असली हिन्दुस्तान




Nathu ki Auladon ne ,
Aysi aag lagai hai,
Ram Rahim ab dushman hain,
Khoon ka pyasa, bhai hai.
Desh ke lal, ab drohi hain ,
Aur Drohi ghar jamai hain.
Kannon ke jo rakhwale the
ab wahi bada , Kasai hai
Insaaf ho raha naam puch ker ,
Tu Akhlak hai, ya Kanhai hai.
Secular ab Sickular ho gaye ,
Ab Gandhi bhi harjaye hai,
Jhoot fareb ka gram bazar,
Satta ki, Press , lugai hai.
Loot machi hai, shoor macha hai,
Kamar torh , Mahngai hai,
bhook se log, Khud kushi ker rahe
Arabpatiyon ki, khub kamai hai,
Kud Uda rahe Pa-ki biryani,
kha, Goli raha, sipahi hai,
Dalit muslim ko mar rahe,
khud kat rahe woh gay hai,
bahut ho gaya, bahut sah liya
bahut sun liya , bahut kah liya
Ek aur Jang-e-azadi,
phir ladni hogi,
Angrez to gaye
bari ab inki hogi
Gira hai bharat, Utha hai bharat.
Kata hai bharat , Juda hai bharat,
Zulm aur Zalim ke aage,
Khabhi nahi ,Jhuka hai bharat.
woh din phir se aayega,
phir se khet lahrayen ge,
Phir Eid diwali hoge sath,
phir hooga hanthon me hanth,
Phir se Gandhi Zinda hoga,
phir azad har banda hoga,
Phir Akhlaq khelega holi,
Phir Ram-Rahim honge Humjoli,
Phir Gandhi-Nehru Zinda hoga,
Phir Azaad, har banda hoga
Yeh mera Desh, Yeh Faiz ki Jaan ,
Yehi hai Asali Hindustaan.

Thursday, March 24, 2016

इन्सानियत की पुकार

इंसानियत की पुकार 

हिन्दू, तो कहीं मुस्लमान, नहीं जीने देते ,
यहूद, तो कहीं नसारा, नहीं जीने देते ,
जाये तो आदमी,जाए किधर ,
ग़ुंचों को , बाग़बान नहीं खिलने देते। 

सियासत ने मोहम्मद (sa) व  मसीह (as) को नहीं छोड़ा ,
राम (Shri) को नहीं छोड़ा , मूसा (as) को नहीं छोड़ा,
शातिर रहा आदमी, हर ज़माने में ,
अना में डूबा फिरौन ने भगवन  को नहीं छोड़ा।

मंदिर ओ मस्जिद , गिरजा बना लिए कितने ,
झूमर ग़लीचे जुगनुओं से, सजा लिए कितने ,
ईमान व  हिदायत, दफ़ना के  उसी फर्श में ,
इंसान और बस्तियाँ  जला  दिए कितने। 

रख लेने से नाम राम ,
या फिर, इस्लाम अपना ,
कोई शरायत पूरी नहीं होती ,
जब तक न बसे मोहब्बत दिल में ,
कोई इबादत , पूरी नहीं होती। 

जंग का म्यार, आज , बहुत निचे उतर आया ,
रहनुमा ही, कहीं क़त्ल तो कहीं धमाका कर आया,
बच्चे , बूढ़े , औरतें या हो जवान ,
ख़ौफ़  में जीता, हर इंसान नज़र आया। 

मक़तूल की मय्यत में सारा शहर आया ,
हुक्मरान आये , हर बशर आया ,
हांथों में  लिए, फूल और शमा,
सब की आँखों में, खून उभर  आया ,

फिर बुझा दिए, शहर और बस्तियां, सारे 
जब आसमान  में उड़ता, उनका क़हर  आया ,
मिली राहत और सुकून , तब जा के उनको ,
जब चीथड़े, बेगुनाहों के, हवाओं में लहर आया,

आतंकी भी ख़ूनी,
हुकूमतें भी ख़ूनी ,
किसी का फरेब ख़िलाफ़त ,
तो किसी का जमहूरियत
दोनों ने किया गुलिस्तां बरबाद ,
दोनों हैं, बराबर के, मुजरिम आज। 

यहाँ ज़ाहिरी और है , बातिन और ,
चल रहा है अब, दज्जलियत का दौर। 
खेल है, ताक़त और मुनाफों  का ,
नशा है,  कुफ्र और गुनाहों का। 

कहीं शयातीन , तो
कहीं पैसों का है राज ,
बेगुनाहों की लाशों पे तिजारत ,
तो कहीं, सियासत हो रही आज ,

वह लोग तो ज़ालिम हैं,
तुम भी सितमगर हो फैज़,
खड़े खड़े देखते रहे ,
लुटती इन्सानियत की लाज। 
 

Tuesday, March 15, 2016

मेरा ख़ून


मेरा ख़ून 

शक है आज उन्हें हमारे  खून पे ,
शक है हमारे  मोहब्बत ओ जुनून  पे ,
भूल गए वह सदयों का हमारा  प्यार ,
जो कर रहे हैं, हमारी वफ़ाओं से इंकार।

आज भी, हमारा ख़ून सही  है ,
यह खून भी वही है , यह कौम भी वही है। 

हम ने, न सिर्फ, हिन्द को बनाया ,
इसे  ख़ून से सिंन्चा , 
नाज़ों से पाला ,
दुल्हन की तरह  सजाया।
 
कभी अपने गिरेबान में भी झांको ,
मिल जाएँ गे  कई, जयचंद,
भले ही, तुम्हे गुमान नहीं होता ,

चन्द अफज़ल गुरु से,
कोई कौम बदनाम नहीं होता ,

हम आज भी टीपू और अशफ़ाक़ हैं,
हम आज भी हमीद  और आज़ाद हैं।

हम कल भी कलाम थे ,
हम आज भी कलाम  हैं।

हमे हमारे हाल से न तौलो ,
हमारा माज़ी भी बुलंद था ,
और हमारा, इंशाअल्लाह,
मुस्तक़बिल भी बुलंद होगा।   


सेयासत की हवा, कुछ , यूँ बदल गई ,

मक्कारों की झूट ओ  साज़िश चल गई ,
अश्फ़ाक के शब्द मुस्लिम हो गए,
बिस्मिल की कविता हिंदू हो गई।

चले थे, कभी जानिब ए मंज़िल साथ साथ ,
कफ़्ले बट्टते गए, अख़लाक़ मरता गया।

कोई, पंजाबी हैं, तमिल और गुजराती भी ,
कोई ब्राह्मण हैं , तो कोई बनया और चमार भी ,
कोई सिख हैं , कोई हिंदू और मुसलमान भी ,

बढ़ी मुश्किल से मिलता , अब यहाँ इंसान भी।   
उजड़ दिया लोभियों ने, सुन्दर  चमन अपना  ,
बाँट लिया , कटोरों में  , हिंदुस्तान भी।
खोल ली सब ने अपनी झूठ की दुकानें ,
मार दी इंसानियत, मार दिए  भगवान भी।

क्यों न रोये  फ़ैज़,  सब ज़िंदा लाश हैं,
खूब फल फूल रहा यहाँ अब, कब्रिस्तान भी, अस्मसान भी। 



Saturday, March 12, 2016

उदास मंजिले

 
 
 उदास मंज़िलें    ( Udas Manzilen )
 

मुसीबतों पे मुझे कुछ यूँ प्यार आया ,
जैसे सदयों बाद , कोई रूठा यार आया ,
किस्मत भी न रोक सकी, मुस्कराहट को,
जब हमने उसे कुछ यूँ गले लगाया 
 
फैज़, वक़्त के साथ सब है आनी जानी ,
रह जायेगा फ़कत, के क्या कमाया, क्या गवाया 
 
 

Musibatoon pe mujhe kuch yun pyaar aaya,

Jayse sadyo baad koi rutha yaar aaya,
Kismat bhi na rok saki muskurahat ko,
Jab humne usse , yun gaale lagaya.
Faiz ,waqt ke sath ,sab hai aani jaani,
Rah Jaye ga fakat, ke kya kamaya, kya gawaya......

Wednesday, February 2, 2011

मेरा रंग , Mera Rang


वक़्त ही जाने मेरा रंग क्या होगा ,
दूध सा सफ़ेद या रात सा स्याह होगा  .

Waqt hi jaane mera raang kya hooga,
Doodh sa saafed ya raat sa sayah hooga.

उम्र गुज़र दी पूरी  , इश्क ए फानी में ,
यूँ लगता है दो चार दिन ही जिया होगा .

Umar guzar di puri, ishqee-e-fani me,
Yun lagta hai do char din hi jiya hooga.

मौत की लगी आहट , तो बैठे कफ्फारा करने  को ,
कहाँ से लाऊँ हिसाब , गुनाह क्या क्या किया होगा .

Maut ki lagi aahat, to bhaithe kaffara kerne ko,
Kahan se laoon, hisab, gunah kya kya kiya hooga

गरीबी भी आजमाईश , अमीरी भी आजमाईश ,
काश सब बेच कर, कुछ नेकी ही खरीद लिया होता . 

Garibi bhi aazmayish, amiri bhi azmayish,
Kash sab beach ker kuch naki hi kharid liya hota.

कभी खींचे है रिश्ता , तो कभी फ़र्ज़ अपनी ओर,
दिमाग की छोढ़ , काश दिल की सुन लिया होता .

Kabi khinche hai rishta , to kabhi farz apni oor
Dimag ki choorh , kash dil ki sun liya hoota.

सभी बैठे हैं खफा , के उनकी नहीं सुनता मै ,
किस किस की सुनू , काश कान ही नहीं दिया होता .

Sabhi, baithe hai khafa ,ke unki nahi sunta mai,
Kiss kiss ki soonu, kash kaan hi na diya hoota,

खरीद लिया वोह सब , जो कब्र में ना जाये साथ ,
या इलाही , काश , कुछ सब्र से भी काम लिया होता .

Karid laye woh sab , jo kabr me na jaye sath,
Ya elahi , kaash, kuch sabrr se bhi kaam liya hoota.

बढ़ी कठिन है डगर,    फैज़ , यहाँ चलना मुश्किल ,
आसां हो जाता  सफ़र , अगर किताब (कोरान  ) से चल लिया होता .

Barhi kathin hai dagar faiz , yahan chalna mushkil,
Aasan ho jata yeh safar, aagar kitab (koran ) se  chal liya hoota

Faiz


Saturday, January 15, 2011

Tu mari Zindagi hai !



तुझे देख के जी लेता हूँ मैं ,
ज़िन्दगी का ज़हर पी लेता हूँ मैं


भरी दूप में चांदनी है तू ,
मेरे  उज्ढ़े घर की ज़िन्दगी है  तू  . 


तेरी मासूम हंसी , गुण्चों की तरह ,
तेरी प्यारी शरारत , तितलियों की तरह .


उसके हांथों के अस्पर्श में , जादू भरा,
उस की सांसों में जैसे  है  खुसबू  बसा  .


उस का चेहरा , सरापा , अल्लाह का  नूर ,
उस की बातें हैं प्यारी और बढ़ी  मशकूक .


उस के रोने में भी है भरी  मौसीकी  ,
उस के होने से जिंदा मेरी ज़िन्दगी .


रौनक है घर की, तू  मेरी जान है .
तेरी ही दम से , मेरे अरमान हैं ,


तेरी धढ़क्नो से धढ़कता , है मेरा जिगर ,
तुझे देख , भूला ,  हर ग़म ओ फिकर .

एक रोज़ देख तुझे ,   आया यह ख्याल ,
मेरा भी जब था तेरे जेसा ही हाल .

मै भी कभी तेरे जैसा ही था ,
मेरे माँ-बाप के लिए भी सब  ऐसा ही था .

वोह भी मुझे यूँ करते थे प्यार ,
मैं भी था उनके ज़िन्दगी का बहार .

मुझ से भी थे उनके अरमान वाबिस्ता ,
सपने , उमीदें , कुछ फराएज ऐ रिश्ता .

यूँ गुज़रता रहा वक़्त , फिर आई जवानी ,
वोह सपने उमीदें सब बन गए पानी ,

डूबा फरयेज़ जैसे , कागज़ की कश्ती ,
हावी हुई मुझ पे दुन्या की मस्ती .

दिया मै भूला वोह  प्यार और रिश्ते ,
रह गए बंकि चंद यादें और किस्से .

छोढ़ के वह दामन  और आँचल तेरा ,
बना मैं हुक्म ए इलाही का मुनकिर बढ़ा .

बुढ़ापे की लाठी था  बनना  तेरा ,
आँखों का नूर , मुसत्कबिल था मेरा .

छोढ़ आया मै , सब कुछ वहीँ दूर , परे ,
दुन्या की आय्शो आराइश के लिए .

बने गा सांप, गले का ,  यही तब
जाएँ गे कब्र ओ दोज़ख में जब .

माँ बाप तब भी करें गे दुआ ,
माफ़ कर दे इलाही , अब बहुत, हुआ .

जन्नत भी लगे गा , काँटा भरा ,
जब तक न होगा ,  उनका बेटा रिहा .

खैर अल्लाह की रहमत , अल्लाह का  फैसला ,
अल्लाह ही सब  जाने , वोह हाकिम बढ़ा .

इस दुन्या का भी फेल  , जैसे को तैसा ,
मुझ को भी मिले गा , हर ज़ख्म ,  वैसा  .


एक दिन ,तू भी, मुझे छोढ़ , चली जाये गी ,
अपनी दुन्या में कहीं तू खो जाये गी ,


मै भी रह जाऊं गा , तढ़पता पढ़ा
अपने गलतियों पे नादिम रोता हूआ  .


दुआ है मेरी, ए रब , ऐसी सूरत तू कर दे ,
हम सब रहें साथ , पूरी हर ज़रुरत तू कर दे .


ना जाये कोई , ना तढ़पे कोई ,

ना रोये  कोई , ना रुलाये कोई .


रहे सब साथ , खुश ओ खुर्रम ,
हमेशा हमेशा , हर दिन, हर दम .

माँ-बाप और बच्चे  , के हों हर फ़र्ज़ पुरे ,
ना मैं जियूं आधा , ना माँ-बाप अधूरे .  

रहें सब साथ,  फैज़ , दुआ है , है सपना ,
फिर,  हर रात दिवाली  , है हर दिन ईद,  अपना.
                                                                                                                                 

Faiz
 ( इन्शाह अल्लाह ! )



Sunday, January 31, 2010

कांच के रिश्ते .

इश्क का भी कुछ अजब दस्तूर है ,
वोह पास हो के भी बहुत दूर है ।

न जाने कब , सनम ही सितमगर बन गया ,
अब ज़िन्दगी के हांथों , मौत भी मंज़ूर है ।

खूब शिद्दत से दिल में जगह दी थी जिन्हें ,
वही बना मेरी दिल का नासूर है ।

कांच की मूरत से रिश्ते , खूब संभाले मैं ने,
बाहर से पुरकशिश ,अंदर से चूर चूर है ।

बुढ़ापे की लाठी बननी थी जो मुझे ,
चाँद सिक्कों के लिए तोढ़ने को मजबूर है ।

कभी किसी रोज़, टूट के खुद फैज़ बिखर जायेगा ,
फिर , जो बचे गा , वोह तू और तेरा गुरूर है ।

Saturday, October 31, 2009

Tanha hoon mai !






meri zindagi udas hai
na koi iske pass hai

ishq ek haseen ehsas hai
sabhi ko aata nahi yeh raas hai

kaha jaye ye tanha dil
ek sakoon ki talash hai

bhatakta hoon mai der badar
ek boond ki bus pyas hai

sagar ne bhi na bujhaye pyasa
methe pani ki talash hai

tu bhale hi, mujhe bool jaye
leta tera naam, meri har saans hai

milte agar to khud dekh lete voh
Faiz bin tere, bus ek zinda lash hai



Saturday, February 14, 2009

इश्क Ishq





कैसी लगाई आग , दिल-ऐ-बेकरार में,
पल-पल लगे है साल , तेरे इंतजार में ......

Kysi lagai aag, dil-e-bekarar me,
Pal-pal lage hai saal, tere intezar me….

सुनी पढ़ई है रात , फीकी है चांदनी,
छायी खेजा है , इस मौसम-ऐ-बाहर में ......

Suni parhi hai raat, phiki hai chandni,
Chaaye khezaan hai, iss, mausam-e-bahaar me.

तारे टोढ़ बीछा दूँ , राह-ऐ-गुज़र में मै
होती गर खुदाई , मेंरे इख्तेयार में.......

Taare torh bicha doon, raah-e-guzar me mai,
Hooti gar khudai , mere ikhtayaar me …

आंखों में शरारत , और आदयें दिल फरेब,
रखा है जाला के आग, दिल-ऐ- गुनाहगार में.......

Aankhon me sharaarat , aur aadayen dil-fareb,
rakhaa hai Jalaa ke aag, dil-e-gunahgar me,

चिरागा हो रहा है , घर घर गली गली ,
आंसू के दिए जलाये हैं, अपने सुने दयार में....

chiraagan hoo raha hai , ghar-ghar gali-gali,
aansu ke diye jalaye hai, apne sune dayaar me॥

ना छीन घर , के यह , मन्दिर है मेरा ,
यादें बसी हैं आप की , इन दार-ओ-दीवार में......

naa cheen ghar, ke yeh , mandir hai mera,
yaaden basi hain aap ki , in daar-o-divar me..

होते ही शाम मुझ को बहकाये आवारगी ,
बहकते कदम लौट आते , वोह कशिश है प्यार में....

hoote hi shaam mujh ko bah-kaye aavargi,
bahakte kadam laut aate, voh kasish hai yaar me..

हर इश्क नामुकम्मल, बिना ,उस, इश्क के,
मिलता है दोनों जहाँ , उस, इश्क-ऐ-गफ्फार में......

har ishq na mukammal , bina uss ishq ke…
milta hai doono jahan , uss , ishq-e-gaffar me…

न इश्क सज़ा , न इश्क मज़ा , इश्क तो जूनून है फैज़,
लेता है सकूण , परवाना भी ,जल जल के प्यार में ......

na ishq saza, na ishq maza, ishq joonu hai faiz,
leta hai sakoon parvana bhi , jaal ke pyaar me…

Friday, December 26, 2008

Iqbal




aataa hai yaad mujhako guzaraa huaa zamaanaa
vo baaG kii bahaare।n vo sab ka chah-chahaanaa

aazaadiyaa।N kahaa।N vo ab apane gho।Nsale kii
apanii Khushii se aanaa apanii Khushii se jaanaa


lagatii ho choT dil par, aataa hai yaad jis dam
shabanam ke aa।Nsuuo।n par kaliyo।n kaa muskuraanaa


vo pyaarii pyaarii surat, vo kaamiinii sii muurat
aabaad jis ke dam se thaa meraa aashiyaanaa

Saturday, December 13, 2008

हर चेहरे में फरेब......


इस मजरूह दिल में, समंदर समाये बैठा हूँ,
फिर भी प्यासा हूँ, तेरी आस लगाये बैठा हूँ।

परोस से ज़्यादा, चिरागा, हो यह जिद है मेरी,
इस हसरत में,घर में ही आग लगाये बैठा हूँ।

मेरे सकूत को शिकस्त न समझना बातिल,
तूफ़ान-ऐ-नूह, अपनी खामोशी में दबाये बैठा हूँ।

तंज़ करते हैं वोह मेरी शिकस्ता चाल पर,
वोह क्या जाने, शहसवार, कितने गिराए बैठा हूँ।


मोहब्बत परस्तों की नही,फायदा परस्तों की दुन्या है,
एक हम हैं जो मौका परस्तों से भी रिश्ता निभाए बैठा हूँ।

लौट आयेंगे, जो चल दिए थे ठुकरा कर, फैज़
मे ही कंज़रफ़ हूँ जो यह आस लगाये बैठा हूँ।

Wednesday, September 24, 2008

WOH BEWAFA TO NA THE.....वोह बेवफा तो न थे...


MAASUM EK CHEHRE KO SEENE LAGA GAYE ,

MERE LAHOO SE PYAS WOH APNI BUJHA GAYE.

मासूम एक चेहरे को सिने लगा गए ,
मेरे लहू से प्यास वोह अपनी बुझा गए ।

JINKE LIYE BANAYE GHAR TINKON KO JODH KER,

WOH RAT JASHN ME MERE GHAR KO JALA GAYE.

जिनके लिए बनाये घर तिनको को जोड़ केर ,
वोह रात जश्न में मेरे घर को जला गए।

AABE HAYAT MUJH KO CHAKHATE THE HOONT SE,

UNHI LABON SE AAJ ZAHAR WOH PILA GAYE.

आब-ऐ-हयात मुझ को चखाते थे होठ से ,
उन्ही लबों से आज ज़हर वोह पिला गए।
KAYSE KARE YEH MUFLIS ZAMANE PE AITBAAR,

KANDHA HI DENE WALLE ,JAB KAFAN CHURA GAYE.

कैसे करे यह मुफलिस ज़माने पे ऐतबार ,
कन्धा ही देने वाले जब कफ़न चुरा गए।

JIS KO BANAYE ZINDAGI DUNYAN SE LADH KE FAIZ,

WOH MAUT KO MERA MUKADDAR BANA GAYE।

जिन को बनाई जिंदगी दुन्या से लड़ के फैज़ ,

वोह मौत को मेरे मुकद्दर बना गए ।

Thursday, September 4, 2008

MERE MAHBOOB


TERE HI DUMM SE ROSHAN ,DIL KA DAYAR HAI
TERE HI ROO SE MERI , DUNYA BAHAR HAI

HER SU , YAHAN HUSAN KA, LAGTA BAZAR HAI
PER TERI HI ARZOO HAI , TUJH SE HI PYAAR HAI

LAKHOON NIGAH UUTH KER ,MUJH PE AATAK GAYE
PER ISS NIGAH KO TERA SIRF , INTAZAR HAI

YEH DIL LAGI NA JANE KAB, DIL KI LAGI BANI
NEENDEN GAYE , CHAAIN GAYA, KHOYA KARAR HAI

TERI SURAAT SE BEHTAR KOI SURAAT NAHI DEKHI
HATTA CHAAND BHI TERE AAGE BEKAAR HAI

PAL BHAR SAHI , BITAYE THE ,LAMHE JO SATH SATH
AAB TAK KE ZINDAGI KA BARHA YAADGAAR HAI.

USS ROOZ JO PILAYE THE NAZROON SE AAP NE
AAB TAK USS SHARAB KA MUJH PE KHUMAAR HAI

TU MILLE , JOON KHOWAB KI TAABEER MILL GAYE
AAB HUUR KE HAASIL SE BHI MUJH KO INKAAR HAI

HER KHOOBIYAAN MAAUJOOD HO, MUMKIN NAHI LEKIN
JITNE BHI HAIN APP ME , WOH BESHUMAAR HAI

TERE HI HAANTH PAHLI BAAR, LUTF-E-SHIKAST MILLE
HAI DILL KA HARNA BHI KYA HASSEN HAAR HAI

LAKH AAYE RAAH-E-MOHABBAAT ME AAB TOOFAAN
HER MUSHKILEN TERE LIYE SAU SAU GAWAR HAI

KAHTE HOO APP , JHOOT KI TARIIF HAI NA PASAND
KAHE JO JHOOT FAIZ , TOO TERA GUNAHGAAR HAI

AAYENA


JAGTE HUE LOGON KO JAGATA HOON MAI,
ANDHOON KE SHAHAR ME AAYENA DEKHATA HOON MAI.

SACCHAI DEKHTI NAHI , BIKTI HAI YAHAN,
KHABAR HOTI NAHI, KHABREEN BANATA HOON MAI.

MASOOM KO MAI NE KATIL BANA DIYA,
AB SCHOOL ME YAHI PATH PARHATA HOON MAI.

SAJDE KE MUSHTAHAQ SER, AAJ THOKRON ME HAIN,
AYSE KITNI DASTAN ROOZ SUNATA HOON MAI,

JINKE ROOH NANGE , WHO KIMTI LABAS PAHNE HAIN,
SHARIF HOON, BA-MUSHKIL TAN CHUPA PATA HOON MAI.

MAHNGAI NE ZAIKA CHINA, BHOOK CHIN LI GHAR KI,
BIRYANI KE KISSE SUNA, BACCHON KO SULATA HOON MAI

HAQIR SAHI , PAL BHAR ME FANA HO JAON GA,
PAL BHAR HI SAHI, ROSHNI TO PHAYLATA HOON MAI.

QATAL BHI KERTE HO AUR HAI WAFA KI UMMED FAIZ,
KAYSE BUJHE GI, JAB AAG SE AAG BUJHATA HOON MAI.

Wednesday, September 3, 2008

अकेला है शहर (AKELA HAI SHAHAR)


गली गली , डगर डगर ,
बढ़ा  अकेला  है   शहर

       ........बढ़ा अकेला है शहर

एक तिश्नगी लगी सी है ,
शाम   हो   या    दोपहर।

        ........बढ़ा अकेला है शहर

सारे जहाँ  की  फ़िक्र  है ,
अपनों  से  ही है  बेखबर

       ........बढ़ा अकेला है शहर

बाशौक कुछ नंग है ,
कुछ गरीबी में मगर

       ........बढ़ा अकेला है शहर

आरज़ूओं में उलझ गए ,
चाह के भी जाएँ किधर

       ........बढ़ा अकेला है शहर

खुला आसमा , ख्वाब है
घोसलों   में    है    गुज़र

       ........बढ़ा अकेला है शहर

सकून की तलाश में ,
फिर्ता हूँ मैं दर - बदर

       ........बढ़ा अकेला है शहर

इमारतें   बना   तो   लीं ,
बना सके न, दिल में  घर

       ........बढ़ा अकेला है शहर

चेहरे सजा  के ख़ूब ख़ूब  ,
ज़ेहन में  है, घुला  ज़हर ,

       ........बढ़ा अकेला है शहर

शरीफ बिलों में घुस गए
मुजरिमों  का  है   क़हर

       ........बढ़ा अकेला है शहर


फ़ैज़  बचा  या   मर   गया ,
इस बात की किसको फ़िकर

       ........बढ़ा अकेला है शहर





گلی گلی، ڈگر ڈگر،بڑھا اکیلا ہے شہر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہرایک تشنگي لگی سی ہے،شام ہو یا دوپہر.


        
........ بڑھا اکیلا ہے شہرسارے جہاں کی فکر ہے،اپنوں سے ہی ہے بے خبر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہرباشوك کچھ ننگ ہے،کچھ غربت میں مگر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہرآرزوؤں میں الجھ گئے،چاہ کے بھی دورہ کدھر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہرکھلا اسما، خواب ہےگھوسلو میں ہے گزر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہرسکون کی تلاش میں،پھرتا ہوں میں شرح - بدر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہرعمارتوں بنا تو لیں،بنا سکے نہ، دل میں گھر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہرچہرے سزا کے خوب خوب،ذہن میں ہے، گھلا زہر،


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہرشریف بلوں میں گھس گئےمجرموں کا ہے قہر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہر
فیض بچا یا مر گیا،اس بات کی کس کو فکر


       
........ بڑھا اکیلا ہے شہر


galee galee , dagar dagar ,

badha akela hai shahar


               ........badha akela hai shahar


ek tishnagee lagee see hai ,

shaam    ho    ya    dopahar.


                ........badha akela hai shahar


saare jahaan kee fikr hai ,

apanon se hee hai bekhabar


                    ........badha akela hai shahar


baashauk kuchh nang hai ,

kuchh gareebee mein magar


                       ........badha akela hai shahar


aarazooon mein ulajh gae ,

chaah ke bhee jaen kidhar


                         ........badha akela hai shahar


khula aasama , khvaab hai

ghosalon  mein  hai   guzar


                            ........badha akela hai shahar


sakoon kee    talaash    mein ,

phirta hoon main dar - badar


                               ........badha akela hai shahar


imaaraten  bana  to  leen ,

bana sake na, dil mein ghar


                               ........badha akela hai shahar


chehare saja ke khoob khoob ,

zehan mein hai, ghula zahar ,


                             ........badha akela hai shahar


sharif  bilon mein ghus gae

mujarimon   ka   hai   qahar


                            ........badha akela hai shahar



faiz bacha ya mar gaya ,

is baat kee kisako fikar
                             ........badha akela hai shahar

- FAIZ MOHAMMAD NAFE.