Thursday, March 24, 2016

इन्सानियत की पुकार

इंसानियत की पुकार 

हिन्दू, तो कहीं मुस्लमान, नहीं जीने देते ,
यहूद, तो कहीं नसारा, नहीं जीने देते ,
जाये तो आदमी,जाए किधर ,
ग़ुंचों को , बाग़बान नहीं खिलने देते। 

सियासत ने मोहम्मद (sa) व  मसीह (as) को नहीं छोड़ा ,
राम (Shri) को नहीं छोड़ा , मूसा (as) को नहीं छोड़ा,
शातिर रहा आदमी, हर ज़माने में ,
अना में डूबा फिरौन ने भगवन  को नहीं छोड़ा।

मंदिर ओ मस्जिद , गिरजा बना लिए कितने ,
झूमर ग़लीचे जुगनुओं से, सजा लिए कितने ,
ईमान व  हिदायत, दफ़ना के  उसी फर्श में ,
इंसान और बस्तियाँ  जला  दिए कितने। 

रख लेने से नाम राम ,
या फिर, इस्लाम अपना ,
कोई शरायत पूरी नहीं होती ,
जब तक न बसे मोहब्बत दिल में ,
कोई इबादत , पूरी नहीं होती। 

जंग का म्यार, आज , बहुत निचे उतर आया ,
रहनुमा ही, कहीं क़त्ल तो कहीं धमाका कर आया,
बच्चे , बूढ़े , औरतें या हो जवान ,
ख़ौफ़  में जीता, हर इंसान नज़र आया। 

मक़तूल की मय्यत में सारा शहर आया ,
हुक्मरान आये , हर बशर आया ,
हांथों में  लिए, फूल और शमा,
सब की आँखों में, खून उभर  आया ,

फिर बुझा दिए, शहर और बस्तियां, सारे 
जब आसमान  में उड़ता, उनका क़हर  आया ,
मिली राहत और सुकून , तब जा के उनको ,
जब चीथड़े, बेगुनाहों के, हवाओं में लहर आया,

आतंकी भी ख़ूनी,
हुकूमतें भी ख़ूनी ,
किसी का फरेब ख़िलाफ़त ,
तो किसी का जमहूरियत
दोनों ने किया गुलिस्तां बरबाद ,
दोनों हैं, बराबर के, मुजरिम आज। 

यहाँ ज़ाहिरी और है , बातिन और ,
चल रहा है अब, दज्जलियत का दौर। 
खेल है, ताक़त और मुनाफों  का ,
नशा है,  कुफ्र और गुनाहों का। 

कहीं शयातीन , तो
कहीं पैसों का है राज ,
बेगुनाहों की लाशों पे तिजारत ,
तो कहीं, सियासत हो रही आज ,

वह लोग तो ज़ालिम हैं,
तुम भी सितमगर हो फैज़,
खड़े खड़े देखते रहे ,
लुटती इन्सानियत की लाज। 
 

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