Tuesday, March 15, 2016

मेरा ख़ून


मेरा ख़ून 

शक है आज उन्हें हमारे  खून पे ,
शक है हमारे  मोहब्बत ओ जुनून  पे ,
भूल गए वह सदयों का हमारा  प्यार ,
जो कर रहे हैं, हमारी वफ़ाओं से इंकार।

आज भी, हमारा ख़ून सही  है ,
यह खून भी वही है , यह कौम भी वही है। 

हम ने, न सिर्फ, हिन्द को बनाया ,
इसे  ख़ून से सिंन्चा , 
नाज़ों से पाला ,
दुल्हन की तरह  सजाया।
 
कभी अपने गिरेबान में भी झांको ,
मिल जाएँ गे  कई, जयचंद,
भले ही, तुम्हे गुमान नहीं होता ,

चन्द अफज़ल गुरु से,
कोई कौम बदनाम नहीं होता ,

हम आज भी टीपू और अशफ़ाक़ हैं,
हम आज भी हमीद  और आज़ाद हैं।

हम कल भी कलाम थे ,
हम आज भी कलाम  हैं।

हमे हमारे हाल से न तौलो ,
हमारा माज़ी भी बुलंद था ,
और हमारा, इंशाअल्लाह,
मुस्तक़बिल भी बुलंद होगा।   


सेयासत की हवा, कुछ , यूँ बदल गई ,

मक्कारों की झूट ओ  साज़िश चल गई ,
अश्फ़ाक के शब्द मुस्लिम हो गए,
बिस्मिल की कविता हिंदू हो गई।

चले थे, कभी जानिब ए मंज़िल साथ साथ ,
कफ़्ले बट्टते गए, अख़लाक़ मरता गया।

कोई, पंजाबी हैं, तमिल और गुजराती भी ,
कोई ब्राह्मण हैं , तो कोई बनया और चमार भी ,
कोई सिख हैं , कोई हिंदू और मुसलमान भी ,

बढ़ी मुश्किल से मिलता , अब यहाँ इंसान भी।   
उजड़ दिया लोभियों ने, सुन्दर  चमन अपना  ,
बाँट लिया , कटोरों में  , हिंदुस्तान भी।
खोल ली सब ने अपनी झूठ की दुकानें ,
मार दी इंसानियत, मार दिए  भगवान भी।

क्यों न रोये  फ़ैज़,  सब ज़िंदा लाश हैं,
खूब फल फूल रहा यहाँ अब, कब्रिस्तान भी, अस्मसान भी। 



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