मेरा ख़ून
शक है आज उन्हें हमारे खून पे ,
शक है हमारे मोहब्बत ओ जुनून पे ,
भूल गए वह सदयों का हमारा प्यार ,
जो कर रहे हैं, हमारी वफ़ाओं से इंकार।
आज भी, हमारा ख़ून सही है ,
यह खून भी वही है , यह कौम भी वही है।
हम ने, न सिर्फ, हिन्द को बनाया ,
इसे ख़ून से सिंन्चा ,
नाज़ों से पाला ,
दुल्हन की तरह सजाया।
कभी अपने गिरेबान में भी झांको ,
मिल जाएँ गे कई, जयचंद,
भले ही, तुम्हे गुमान नहीं होता ,
चन्द अफज़ल गुरु से,
कोई कौम बदनाम नहीं होता ,
हम आज भी टीपू और अशफ़ाक़ हैं,
हम आज भी हमीद और आज़ाद हैं।
हम कल भी कलाम थे ,
हम आज भी कलाम हैं।
हमे हमारे हाल से न तौलो ,
हमारा माज़ी भी बुलंद था ,
और हमारा, इंशाअल्लाह,
मुस्तक़बिल भी बुलंद होगा।
सेयासत की हवा, कुछ , यूँ बदल गई ,
मक्कारों की झूट ओ साज़िश चल गई ,
अश्फ़ाक के शब्द मुस्लिम हो गए,
बिस्मिल की कविता हिंदू हो गई।
चले थे, कभी जानिब ए मंज़िल साथ साथ ,
कफ़्ले बट्टते गए, अख़लाक़ मरता गया।
कोई, पंजाबी हैं, तमिल और गुजराती भी ,
कोई ब्राह्मण हैं , तो कोई बनया और चमार भी ,
कोई सिख हैं , कोई हिंदू और मुसलमान भी ,
बढ़ी मुश्किल से मिलता , अब यहाँ इंसान भी।
उजड़ दिया लोभियों ने, सुन्दर चमन अपना ,
बाँट लिया , कटोरों में , हिंदुस्तान भी।
खोल ली सब ने अपनी झूठ की दुकानें ,
मार दी इंसानियत, मार दिए भगवान भी।
क्यों न रोये फ़ैज़, सब ज़िंदा लाश हैं,
खूब फल फूल रहा यहाँ अब, कब्रिस्तान भी, अस्मसान भी।

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