
इस मजरूह दिल में, समंदर समाये बैठा हूँ,
फिर भी प्यासा हूँ, तेरी आस लगाये बैठा हूँ।
परोस से ज़्यादा, चिरागा, हो यह जिद है मेरी,
इस हसरत में,घर में ही आग लगाये बैठा हूँ।
मेरे सकूत को शिकस्त न समझना बातिल,
तूफ़ान-ऐ-नूह, अपनी खामोशी में दबाये बैठा हूँ।
तंज़ करते हैं वोह मेरी शिकस्ता चाल पर,
वोह क्या जाने, शहसवार, कितने गिराए बैठा हूँ।
वोह क्या जाने, शहसवार, कितने गिराए बैठा हूँ।
मोहब्बत परस्तों की नही,फायदा परस्तों की दुन्या है,
एक हम हैं जो मौका परस्तों से भी रिश्ता निभाए बैठा हूँ।
लौट आयेंगे, जो चल दिए थे ठुकरा कर, फैज़
मे ही कंज़रफ़ हूँ जो यह आस लगाये बैठा हूँ।
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