Wednesday, February 2, 2011

मेरा रंग , Mera Rang


वक़्त ही जाने मेरा रंग क्या होगा ,
दूध सा सफ़ेद या रात सा स्याह होगा  .

Waqt hi jaane mera raang kya hooga,
Doodh sa saafed ya raat sa sayah hooga.

उम्र गुज़र दी पूरी  , इश्क ए फानी में ,
यूँ लगता है दो चार दिन ही जिया होगा .

Umar guzar di puri, ishqee-e-fani me,
Yun lagta hai do char din hi jiya hooga.

मौत की लगी आहट , तो बैठे कफ्फारा करने  को ,
कहाँ से लाऊँ हिसाब , गुनाह क्या क्या किया होगा .

Maut ki lagi aahat, to bhaithe kaffara kerne ko,
Kahan se laoon, hisab, gunah kya kya kiya hooga

गरीबी भी आजमाईश , अमीरी भी आजमाईश ,
काश सब बेच कर, कुछ नेकी ही खरीद लिया होता . 

Garibi bhi aazmayish, amiri bhi azmayish,
Kash sab beach ker kuch naki hi kharid liya hota.

कभी खींचे है रिश्ता , तो कभी फ़र्ज़ अपनी ओर,
दिमाग की छोढ़ , काश दिल की सुन लिया होता .

Kabi khinche hai rishta , to kabhi farz apni oor
Dimag ki choorh , kash dil ki sun liya hoota.

सभी बैठे हैं खफा , के उनकी नहीं सुनता मै ,
किस किस की सुनू , काश कान ही नहीं दिया होता .

Sabhi, baithe hai khafa ,ke unki nahi sunta mai,
Kiss kiss ki soonu, kash kaan hi na diya hoota,

खरीद लिया वोह सब , जो कब्र में ना जाये साथ ,
या इलाही , काश , कुछ सब्र से भी काम लिया होता .

Karid laye woh sab , jo kabr me na jaye sath,
Ya elahi , kaash, kuch sabrr se bhi kaam liya hoota.

बढ़ी कठिन है डगर,    फैज़ , यहाँ चलना मुश्किल ,
आसां हो जाता  सफ़र , अगर किताब (कोरान  ) से चल लिया होता .

Barhi kathin hai dagar faiz , yahan chalna mushkil,
Aasan ho jata yeh safar, aagar kitab (koran ) se  chal liya hoota

Faiz


Saturday, January 15, 2011

Tu mari Zindagi hai !



तुझे देख के जी लेता हूँ मैं ,
ज़िन्दगी का ज़हर पी लेता हूँ मैं


भरी दूप में चांदनी है तू ,
मेरे  उज्ढ़े घर की ज़िन्दगी है  तू  . 


तेरी मासूम हंसी , गुण्चों की तरह ,
तेरी प्यारी शरारत , तितलियों की तरह .


उसके हांथों के अस्पर्श में , जादू भरा,
उस की सांसों में जैसे  है  खुसबू  बसा  .


उस का चेहरा , सरापा , अल्लाह का  नूर ,
उस की बातें हैं प्यारी और बढ़ी  मशकूक .


उस के रोने में भी है भरी  मौसीकी  ,
उस के होने से जिंदा मेरी ज़िन्दगी .


रौनक है घर की, तू  मेरी जान है .
तेरी ही दम से , मेरे अरमान हैं ,


तेरी धढ़क्नो से धढ़कता , है मेरा जिगर ,
तुझे देख , भूला ,  हर ग़म ओ फिकर .

एक रोज़ देख तुझे ,   आया यह ख्याल ,
मेरा भी जब था तेरे जेसा ही हाल .

मै भी कभी तेरे जैसा ही था ,
मेरे माँ-बाप के लिए भी सब  ऐसा ही था .

वोह भी मुझे यूँ करते थे प्यार ,
मैं भी था उनके ज़िन्दगी का बहार .

मुझ से भी थे उनके अरमान वाबिस्ता ,
सपने , उमीदें , कुछ फराएज ऐ रिश्ता .

यूँ गुज़रता रहा वक़्त , फिर आई जवानी ,
वोह सपने उमीदें सब बन गए पानी ,

डूबा फरयेज़ जैसे , कागज़ की कश्ती ,
हावी हुई मुझ पे दुन्या की मस्ती .

दिया मै भूला वोह  प्यार और रिश्ते ,
रह गए बंकि चंद यादें और किस्से .

छोढ़ के वह दामन  और आँचल तेरा ,
बना मैं हुक्म ए इलाही का मुनकिर बढ़ा .

बुढ़ापे की लाठी था  बनना  तेरा ,
आँखों का नूर , मुसत्कबिल था मेरा .

छोढ़ आया मै , सब कुछ वहीँ दूर , परे ,
दुन्या की आय्शो आराइश के लिए .

बने गा सांप, गले का ,  यही तब
जाएँ गे कब्र ओ दोज़ख में जब .

माँ बाप तब भी करें गे दुआ ,
माफ़ कर दे इलाही , अब बहुत, हुआ .

जन्नत भी लगे गा , काँटा भरा ,
जब तक न होगा ,  उनका बेटा रिहा .

खैर अल्लाह की रहमत , अल्लाह का  फैसला ,
अल्लाह ही सब  जाने , वोह हाकिम बढ़ा .

इस दुन्या का भी फेल  , जैसे को तैसा ,
मुझ को भी मिले गा , हर ज़ख्म ,  वैसा  .


एक दिन ,तू भी, मुझे छोढ़ , चली जाये गी ,
अपनी दुन्या में कहीं तू खो जाये गी ,


मै भी रह जाऊं गा , तढ़पता पढ़ा
अपने गलतियों पे नादिम रोता हूआ  .


दुआ है मेरी, ए रब , ऐसी सूरत तू कर दे ,
हम सब रहें साथ , पूरी हर ज़रुरत तू कर दे .


ना जाये कोई , ना तढ़पे कोई ,

ना रोये  कोई , ना रुलाये कोई .


रहे सब साथ , खुश ओ खुर्रम ,
हमेशा हमेशा , हर दिन, हर दम .

माँ-बाप और बच्चे  , के हों हर फ़र्ज़ पुरे ,
ना मैं जियूं आधा , ना माँ-बाप अधूरे .  

रहें सब साथ,  फैज़ , दुआ है , है सपना ,
फिर,  हर रात दिवाली  , है हर दिन ईद,  अपना.
                                                                                                                                 

Faiz
 ( इन्शाह अल्लाह ! )



Sunday, January 31, 2010

कांच के रिश्ते .

इश्क का भी कुछ अजब दस्तूर है ,
वोह पास हो के भी बहुत दूर है ।

न जाने कब , सनम ही सितमगर बन गया ,
अब ज़िन्दगी के हांथों , मौत भी मंज़ूर है ।

खूब शिद्दत से दिल में जगह दी थी जिन्हें ,
वही बना मेरी दिल का नासूर है ।

कांच की मूरत से रिश्ते , खूब संभाले मैं ने,
बाहर से पुरकशिश ,अंदर से चूर चूर है ।

बुढ़ापे की लाठी बननी थी जो मुझे ,
चाँद सिक्कों के लिए तोढ़ने को मजबूर है ।

कभी किसी रोज़, टूट के खुद फैज़ बिखर जायेगा ,
फिर , जो बचे गा , वोह तू और तेरा गुरूर है ।

Saturday, October 31, 2009

Tanha hoon mai !






meri zindagi udas hai
na koi iske pass hai

ishq ek haseen ehsas hai
sabhi ko aata nahi yeh raas hai

kaha jaye ye tanha dil
ek sakoon ki talash hai

bhatakta hoon mai der badar
ek boond ki bus pyas hai

sagar ne bhi na bujhaye pyasa
methe pani ki talash hai

tu bhale hi, mujhe bool jaye
leta tera naam, meri har saans hai

milte agar to khud dekh lete voh
Faiz bin tere, bus ek zinda lash hai



Saturday, February 14, 2009

इश्क Ishq





कैसी लगाई आग , दिल-ऐ-बेकरार में,
पल-पल लगे है साल , तेरे इंतजार में ......

Kysi lagai aag, dil-e-bekarar me,
Pal-pal lage hai saal, tere intezar me….

सुनी पढ़ई है रात , फीकी है चांदनी,
छायी खेजा है , इस मौसम-ऐ-बाहर में ......

Suni parhi hai raat, phiki hai chandni,
Chaaye khezaan hai, iss, mausam-e-bahaar me.

तारे टोढ़ बीछा दूँ , राह-ऐ-गुज़र में मै
होती गर खुदाई , मेंरे इख्तेयार में.......

Taare torh bicha doon, raah-e-guzar me mai,
Hooti gar khudai , mere ikhtayaar me …

आंखों में शरारत , और आदयें दिल फरेब,
रखा है जाला के आग, दिल-ऐ- गुनाहगार में.......

Aankhon me sharaarat , aur aadayen dil-fareb,
rakhaa hai Jalaa ke aag, dil-e-gunahgar me,

चिरागा हो रहा है , घर घर गली गली ,
आंसू के दिए जलाये हैं, अपने सुने दयार में....

chiraagan hoo raha hai , ghar-ghar gali-gali,
aansu ke diye jalaye hai, apne sune dayaar me॥

ना छीन घर , के यह , मन्दिर है मेरा ,
यादें बसी हैं आप की , इन दार-ओ-दीवार में......

naa cheen ghar, ke yeh , mandir hai mera,
yaaden basi hain aap ki , in daar-o-divar me..

होते ही शाम मुझ को बहकाये आवारगी ,
बहकते कदम लौट आते , वोह कशिश है प्यार में....

hoote hi shaam mujh ko bah-kaye aavargi,
bahakte kadam laut aate, voh kasish hai yaar me..

हर इश्क नामुकम्मल, बिना ,उस, इश्क के,
मिलता है दोनों जहाँ , उस, इश्क-ऐ-गफ्फार में......

har ishq na mukammal , bina uss ishq ke…
milta hai doono jahan , uss , ishq-e-gaffar me…

न इश्क सज़ा , न इश्क मज़ा , इश्क तो जूनून है फैज़,
लेता है सकूण , परवाना भी ,जल जल के प्यार में ......

na ishq saza, na ishq maza, ishq joonu hai faiz,
leta hai sakoon parvana bhi , jaal ke pyaar me…

Friday, December 26, 2008

Iqbal




aataa hai yaad mujhako guzaraa huaa zamaanaa
vo baaG kii bahaare।n vo sab ka chah-chahaanaa

aazaadiyaa।N kahaa।N vo ab apane gho।Nsale kii
apanii Khushii se aanaa apanii Khushii se jaanaa


lagatii ho choT dil par, aataa hai yaad jis dam
shabanam ke aa।Nsuuo।n par kaliyo।n kaa muskuraanaa


vo pyaarii pyaarii surat, vo kaamiinii sii muurat
aabaad jis ke dam se thaa meraa aashiyaanaa

Saturday, December 13, 2008

हर चेहरे में फरेब......


इस मजरूह दिल में, समंदर समाये बैठा हूँ,
फिर भी प्यासा हूँ, तेरी आस लगाये बैठा हूँ।

परोस से ज़्यादा, चिरागा, हो यह जिद है मेरी,
इस हसरत में,घर में ही आग लगाये बैठा हूँ।

मेरे सकूत को शिकस्त न समझना बातिल,
तूफ़ान-ऐ-नूह, अपनी खामोशी में दबाये बैठा हूँ।

तंज़ करते हैं वोह मेरी शिकस्ता चाल पर,
वोह क्या जाने, शहसवार, कितने गिराए बैठा हूँ।


मोहब्बत परस्तों की नही,फायदा परस्तों की दुन्या है,
एक हम हैं जो मौका परस्तों से भी रिश्ता निभाए बैठा हूँ।

लौट आयेंगे, जो चल दिए थे ठुकरा कर, फैज़
मे ही कंज़रफ़ हूँ जो यह आस लगाये बैठा हूँ।