Saturday, January 15, 2011

Tu mari Zindagi hai !



तुझे देख के जी लेता हूँ मैं ,
ज़िन्दगी का ज़हर पी लेता हूँ मैं


भरी दूप में चांदनी है तू ,
मेरे  उज्ढ़े घर की ज़िन्दगी है  तू  . 


तेरी मासूम हंसी , गुण्चों की तरह ,
तेरी प्यारी शरारत , तितलियों की तरह .


उसके हांथों के अस्पर्श में , जादू भरा,
उस की सांसों में जैसे  है  खुसबू  बसा  .


उस का चेहरा , सरापा , अल्लाह का  नूर ,
उस की बातें हैं प्यारी और बढ़ी  मशकूक .


उस के रोने में भी है भरी  मौसीकी  ,
उस के होने से जिंदा मेरी ज़िन्दगी .


रौनक है घर की, तू  मेरी जान है .
तेरी ही दम से , मेरे अरमान हैं ,


तेरी धढ़क्नो से धढ़कता , है मेरा जिगर ,
तुझे देख , भूला ,  हर ग़म ओ फिकर .

एक रोज़ देख तुझे ,   आया यह ख्याल ,
मेरा भी जब था तेरे जेसा ही हाल .

मै भी कभी तेरे जैसा ही था ,
मेरे माँ-बाप के लिए भी सब  ऐसा ही था .

वोह भी मुझे यूँ करते थे प्यार ,
मैं भी था उनके ज़िन्दगी का बहार .

मुझ से भी थे उनके अरमान वाबिस्ता ,
सपने , उमीदें , कुछ फराएज ऐ रिश्ता .

यूँ गुज़रता रहा वक़्त , फिर आई जवानी ,
वोह सपने उमीदें सब बन गए पानी ,

डूबा फरयेज़ जैसे , कागज़ की कश्ती ,
हावी हुई मुझ पे दुन्या की मस्ती .

दिया मै भूला वोह  प्यार और रिश्ते ,
रह गए बंकि चंद यादें और किस्से .

छोढ़ के वह दामन  और आँचल तेरा ,
बना मैं हुक्म ए इलाही का मुनकिर बढ़ा .

बुढ़ापे की लाठी था  बनना  तेरा ,
आँखों का नूर , मुसत्कबिल था मेरा .

छोढ़ आया मै , सब कुछ वहीँ दूर , परे ,
दुन्या की आय्शो आराइश के लिए .

बने गा सांप, गले का ,  यही तब
जाएँ गे कब्र ओ दोज़ख में जब .

माँ बाप तब भी करें गे दुआ ,
माफ़ कर दे इलाही , अब बहुत, हुआ .

जन्नत भी लगे गा , काँटा भरा ,
जब तक न होगा ,  उनका बेटा रिहा .

खैर अल्लाह की रहमत , अल्लाह का  फैसला ,
अल्लाह ही सब  जाने , वोह हाकिम बढ़ा .

इस दुन्या का भी फेल  , जैसे को तैसा ,
मुझ को भी मिले गा , हर ज़ख्म ,  वैसा  .


एक दिन ,तू भी, मुझे छोढ़ , चली जाये गी ,
अपनी दुन्या में कहीं तू खो जाये गी ,


मै भी रह जाऊं गा , तढ़पता पढ़ा
अपने गलतियों पे नादिम रोता हूआ  .


दुआ है मेरी, ए रब , ऐसी सूरत तू कर दे ,
हम सब रहें साथ , पूरी हर ज़रुरत तू कर दे .


ना जाये कोई , ना तढ़पे कोई ,

ना रोये  कोई , ना रुलाये कोई .


रहे सब साथ , खुश ओ खुर्रम ,
हमेशा हमेशा , हर दिन, हर दम .

माँ-बाप और बच्चे  , के हों हर फ़र्ज़ पुरे ,
ना मैं जियूं आधा , ना माँ-बाप अधूरे .  

रहें सब साथ,  फैज़ , दुआ है , है सपना ,
फिर,  हर रात दिवाली  , है हर दिन ईद,  अपना.
                                                                                                                                 

Faiz
 ( इन्शाह अल्लाह ! )