तुझे देख के जी लेता हूँ मैं ,
ज़िन्दगी का ज़हर पी लेता हूँ मैं ।
भरी दूप में चांदनी है तू ,
मेरे उज्ढ़े घर की ज़िन्दगी है तू .
तेरी मासूम हंसी , गुण्चों की तरह ,
तेरी प्यारी शरारत , तितलियों की तरह .
उसके हांथों के अस्पर्श में , जादू भरा,
उस की सांसों में जैसे है खुसबू बसा .
उस का चेहरा , सरापा , अल्लाह का नूर ,
उस की बातें हैं प्यारी और बढ़ी मशकूक .
उस के रोने में भी है भरी मौसीकी ,
उस के होने से जिंदा मेरी ज़िन्दगी .
रौनक है घर की, तू मेरी जान है .
तेरी ही दम से , मेरे अरमान हैं ,
तेरी धढ़क्नो से धढ़कता , है मेरा जिगर ,
तुझे देख , भूला , हर ग़म ओ फिकर .
एक रोज़ देख तुझे , आया यह ख्याल ,
मेरा भी जब था तेरे जेसा ही हाल .
मै भी कभी तेरे जैसा ही था ,
मेरे माँ-बाप के लिए भी सब ऐसा ही था .
वोह भी मुझे यूँ करते थे प्यार ,
मैं भी था उनके ज़िन्दगी का बहार .
मुझ से भी थे उनके अरमान वाबिस्ता ,
सपने , उमीदें , कुछ फराएज ऐ रिश्ता .
यूँ गुज़रता रहा वक़्त , फिर आई जवानी ,
वोह सपने उमीदें सब बन गए पानी ,
डूबा फरयेज़ जैसे , कागज़ की कश्ती ,
हावी हुई मुझ पे दुन्या की मस्ती .
दिया मै भूला वोह प्यार और रिश्ते ,
रह गए बंकि चंद यादें और किस्से .
छोढ़ के वह दामन और आँचल तेरा ,
बना मैं हुक्म ए इलाही का मुनकिर बढ़ा .
बुढ़ापे की लाठी था बनना तेरा ,
आँखों का नूर , मुसत्कबिल था मेरा .
छोढ़ आया मै , सब कुछ वहीँ दूर , परे ,
दुन्या की आय्शो आराइश के लिए .
बने गा सांप, गले का , यही तब
जाएँ गे कब्र ओ दोज़ख में जब .
माँ बाप तब भी करें गे दुआ ,
माफ़ कर दे इलाही , अब बहुत, हुआ .
जन्नत भी लगे गा , काँटा भरा ,
जब तक न होगा , उनका बेटा रिहा .
खैर अल्लाह की रहमत , अल्लाह का फैसला ,
अल्लाह ही सब जाने , वोह हाकिम बढ़ा .
इस दुन्या का भी फेल , जैसे को तैसा ,
मुझ को भी मिले गा , हर ज़ख्म , वैसा .
एक दिन ,तू भी, मुझे छोढ़ , चली जाये गी ,
अपनी दुन्या में कहीं तू खो जाये गी ,
मै भी रह जाऊं गा , तढ़पता पढ़ा
अपने गलतियों पे नादिम रोता हूआ .
दुआ है मेरी, ए रब , ऐसी सूरत तू कर दे ,
हम सब रहें साथ , पूरी हर ज़रुरत तू कर दे .
ना जाये कोई , ना तढ़पे कोई ,
ना रोये कोई , ना रुलाये कोई .
रहे सब साथ , खुश ओ खुर्रम ,
हमेशा हमेशा , हर दिन, हर दम .
माँ-बाप और बच्चे , के हों हर फ़र्ज़ पुरे ,
ना मैं जियूं आधा , ना माँ-बाप अधूरे .
रहें सब साथ, फैज़ , दुआ है , है सपना ,
फिर, हर रात दिवाली , है हर दिन ईद, अपना.
Faiz
( इन्शाह अल्लाह ! )
तेरी मासूम हंसी , गुण्चों की तरह ,
तेरी प्यारी शरारत , तितलियों की तरह .
उसके हांथों के अस्पर्श में , जादू भरा,
उस की सांसों में जैसे है खुसबू बसा .
उस का चेहरा , सरापा , अल्लाह का नूर ,
उस की बातें हैं प्यारी और बढ़ी मशकूक .
उस के रोने में भी है भरी मौसीकी ,
उस के होने से जिंदा मेरी ज़िन्दगी .
रौनक है घर की, तू मेरी जान है .
तेरी ही दम से , मेरे अरमान हैं ,
तेरी धढ़क्नो से धढ़कता , है मेरा जिगर ,
तुझे देख , भूला , हर ग़म ओ फिकर .
एक रोज़ देख तुझे , आया यह ख्याल ,
मेरा भी जब था तेरे जेसा ही हाल .
मै भी कभी तेरे जैसा ही था ,
मेरे माँ-बाप के लिए भी सब ऐसा ही था .
वोह भी मुझे यूँ करते थे प्यार ,
मैं भी था उनके ज़िन्दगी का बहार .
मुझ से भी थे उनके अरमान वाबिस्ता ,
सपने , उमीदें , कुछ फराएज ऐ रिश्ता .
यूँ गुज़रता रहा वक़्त , फिर आई जवानी ,
वोह सपने उमीदें सब बन गए पानी ,
डूबा फरयेज़ जैसे , कागज़ की कश्ती ,
हावी हुई मुझ पे दुन्या की मस्ती .
दिया मै भूला वोह प्यार और रिश्ते ,
रह गए बंकि चंद यादें और किस्से .
छोढ़ के वह दामन और आँचल तेरा ,
बना मैं हुक्म ए इलाही का मुनकिर बढ़ा .
बुढ़ापे की लाठी था बनना तेरा ,
आँखों का नूर , मुसत्कबिल था मेरा .
छोढ़ आया मै , सब कुछ वहीँ दूर , परे ,
दुन्या की आय्शो आराइश के लिए .
बने गा सांप, गले का , यही तब
जाएँ गे कब्र ओ दोज़ख में जब .
माँ बाप तब भी करें गे दुआ ,
माफ़ कर दे इलाही , अब बहुत, हुआ .
जन्नत भी लगे गा , काँटा भरा ,
जब तक न होगा , उनका बेटा रिहा .
खैर अल्लाह की रहमत , अल्लाह का फैसला ,
अल्लाह ही सब जाने , वोह हाकिम बढ़ा .
इस दुन्या का भी फेल , जैसे को तैसा ,
मुझ को भी मिले गा , हर ज़ख्म , वैसा .
एक दिन ,तू भी, मुझे छोढ़ , चली जाये गी ,
अपनी दुन्या में कहीं तू खो जाये गी ,
मै भी रह जाऊं गा , तढ़पता पढ़ा
अपने गलतियों पे नादिम रोता हूआ .
दुआ है मेरी, ए रब , ऐसी सूरत तू कर दे ,
हम सब रहें साथ , पूरी हर ज़रुरत तू कर दे .
ना जाये कोई , ना तढ़पे कोई ,
ना रोये कोई , ना रुलाये कोई .
रहे सब साथ , खुश ओ खुर्रम ,
हमेशा हमेशा , हर दिन, हर दम .
माँ-बाप और बच्चे , के हों हर फ़र्ज़ पुरे ,
ना मैं जियूं आधा , ना माँ-बाप अधूरे .
रहें सब साथ, फैज़ , दुआ है , है सपना ,
फिर, हर रात दिवाली , है हर दिन ईद, अपना.
Faiz
( इन्शाह अल्लाह ! )
